Wednesday, April 18, 2007

" एक खोज "

जा रहा हूँ कहाँ में
यह मुझे कुछ नहीं है पता
खोजता हूँ अपना वजूद इस जहां में
पाता हूँ खुद को लापता
खोजता हूँ खुद को
पर खोता ही जा रहा हूँ
गुमनामियों के अंधेरों में
डूबता जा रहा हूँ
पर अब ज्ञान की जोत
लगी है मेरे हाथ
ले ही आउंगा अपने वजूद को

ज़ीनदगी के साथ
अब नहीं भटकूंगा
ऊँन बदनाम गलियों में
अब नहीं लौटूंगा
ऊनं गुमनाम रास्तों पर
अब मुझे बढ़ना है
यंत्रवत
उस शिखर की ओर
शिखर जो मेरे कद से कहीं ऊंचा है
पर मुझे उठना है उन्ही ऊंचायीयों तक
अब मुझे पता है
कहाँ जा रहा हूँ में